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श्री मंदोदरी सीता की होली Kumaoni holi gayi gayi asur teri naar mandodari

कुमाऊँनी होली

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संकलित एवं सत्यापित: Gunjan Upadhyay — भजन लेख टीम

जोड़ा गया: 5 मार्च 2024

भजन का अर्थ

यह कुमाऊंनी होली गीत रामायण के उस प्रसंग पर आधारित है जब रावण-पत्नी मंदोदरी माता सीता को मनाने अशोक वाटिका जाती है। भोजन, जल और चुनरी की पेशकश को सीता जी दृढ़ता से ठुकरा देती हैं।

सीता जी स्पष्ट कहती हैं कि वे राम की पत्नी हैं और लंका उनका मायका नहीं हो सकता, भले ही रावण-कुल का नाश ही क्यों न हो जाए।

यह भजन कब और क्यों गाया जाता है

कुमाऊं क्षेत्र में होली के अवसर पर बैठकी होली की परंपरा में ऐसे शास्त्रीय रामायण-प्रसंगों पर आधारित गीत गाए जाते हैं, विशेषकर होल्यार मंडली की महफिलों में।

इससे जुड़ी मान्यता

यह गीत रामायण के सुंदरकांड प्रसंग से जुड़ा है, जब रावण की पत्नी मंदोदरी स्वयं अशोक वाटिका जाकर बंदी सीता जी को रावण की पटरानी बनने के लिए मनाती है। सीता जी का अटूट सतीत्व और दृढ़ निश्चय इस गीत का मूल भाव है।

भजन के बोल

गई गई असुर तेरी नार मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा में गई.....

थाली भर-भर भोजन ले गई

और गटुवन में नीर मन्दोदरी सिया मिलन गई बागा में गई-गई ......

कौन राजा की बेटी कहियो, कौन राजा घर ब्याहि मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

राजा जनक की बेटी कहियो, राजा दशस्थ घर ब्याहि मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

कहा तुम्हारो नाम जो कहिये, कौन पुरूष की नारि मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

सीता नाम हमारो कहिये, राम चन्द्र की नारि मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

लो सीता यह भोजन करि लो, पियो गंगा जल नीर मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

ना हम तुमरे भोजन करि है, ना पीवै जल नीर मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

लो सीता यह चुनरी ओढ़ो, बनों लंकापति नार मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई-गई .....

ना हम तुमरी चुनरी ओढ़े, ना हम लंकापति नार मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

जो तुम सिता सत्यवन्ती कहिये, हमरे राजा संग आई मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

लंका हमरो मायका कहिये, मन्दोदरी मेरी माय मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई गई .....

जो हम सीता सत्यवन्ती कहिये, होवै रावण कुल नाश मन्दोदरी

सिया मिलन गई बागा गई-गई .....

गई गई रे असुर तेरी नार मन्दादरी सिया मिलन गई बागा में .....

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