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जय रामेश्वर जय नागेश्वर वैद्यनाथ केदार हरे Shiv Bhajan Lyrics
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जय रामेश्वर जय नागेश्वर वैद्यनाथ केदार हरे Shiv Bhajan Lyrics

शिव भजन

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संकलित एवं सत्यापित: Gunjan Upadhyay — भजन लेख टीम

जोड़ा गया: 30 अगस्त 2026

भजन का अर्थ

यह दिव्य शिव भजन भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों (12 Jyotirlingas) और उनके कल्याणकारी स्वरूप की महिमा का एक सुंदर वर्णन है। इस स्तुति में महादेव को रामेश्वर, नागेश्वर, केदारनाथ और विश्वनाथ जैसे पवित्र नामों से पुकारते हुए उनकी दिव्य लीलाओं को नमन किया गया है। भक्त शिव जी को सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार और समस्त सुखों का मूल आधार मानकर उनकी शरण में जाता है। गंगाधर और कैलाशी रूप की आराधना करने वाला यह भजन मन को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। हर-हर शम्भो की गूंज के साथ यह पाठ भक्तों के कष्टों को दूर कर जीवन में सुख-समृद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

भजन के बोल

जय रामेश्वर जय नागेश्वर वैद्यनाथ केदार हरे जय शिवशंकर जय गंगाधर करूणाकर करतार हरे।

जय कैलाशी जय अविनाशी सुखराशी सुखसार हरे।

जय शशिशेखर जय डमरूधर जय जय प्रेमागार हरे।

जय त्रिपुरारी जय मदहारी नित्य अनन्त अपार हरे।

निर्गुण जय जय सगुण अनामय निराकार साकार हरे।

पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।

जय रामेश्वर जय नागेश्वर वैद्यनाथ केदार हरे।

मल्लिकार्जुन सोमनाथ जय महाकार ओंकार हरे।

जय त्रयम्बकेश्वर जय भुवनेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे।

काशीपति श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अधहार हरे।

नीलकंठ जय भूतनाथ जय मृतुंजय अविकार हरे।

पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।

भोलानाथ कृपालु दयामय अवढर दानी शिवयोगी।

निमिष मात्र में देते है नवनिधि मनमानी शिवयोगी।

सरल हृदय अति करूणासागर अकथ कहानी शिवयोगी।

भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर बने मसानी शिवयोगी।

स्वयं अकिंचन जन मन रंजन पर शिव परम उदार हरे।

पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।

आशुतोष इस मोहमयी निद्रा मुझे जगा देना।

विषय वेदना से विषयों की मायाधीश छुड़ा देना।

रूप सुधा की एक बूद से जीवन मुक्त बना देना।

दिव्य ज्ञान भण्डार युगल चरणों की लगन लगा देना।

एक बार इस मन मन्दिर में कीजे पद संचार हरे।

पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।

दानी हो दो भिक्षा में अपनी अनपायनी भक्ति विभो।

शक्तिमान हो दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो।

त्यागी हो दो इस असार संसारपूर्ण वैराग्य प्रभो।

परम पिता हो दो तुम अपने चरणों में अनुराण प्रभो।

स्वामी हो निज सेवक की सुन लीजे करूण पुकार हरे।

पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।

तुम बिन व्यकुल हूँ प्राणेश्वर आ जाओ भगवन्त हरे।

चरण कमल की बॉह गही है उमा रमण प्रियकांत हरें।

विरह व्यथित हूँ दीन दुखी हूँ दीन दयाल अनन्त हरे।

आओ तुम मेरे हो जाओ आ जाओ श्रीमंत हरे।

मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।

पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।

जय महेश जय जय भवेश जय आदि देव महादेव विभो।

किस मुख से हे गुणातीत प्रभुत तव अपार गुण वर्णन हो।

जय भव तारक दारक हारक पातक तारक शिव शम्भो।

दीनन दुःख हर सर्व सुखाकर प्रेम सुधाकर की जय हो।

पार लगा दो भवसागर से बनकर करूणा धार हरे।

पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।

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