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गुरुवार श्री बृहस्पति देव की आरती || Shri Brihaspati Dev Ji Ki Aarti Lyrics
कृष्ण भजन
संकलित एवं सत्यापित: Gunjan Upadhyay — भजन लेख टीम
भजन का अर्थ
यह आरती देवगुरु बृहस्पति की स्तुति है, जिन्हें ज्ञान, बुद्धि, धन और पुत्र-पौत्र देने वाला तथा नवग्रहों में सबसे बड़ा और शक्तिशाली देवता माना जाता है।
आरती में उन्हें पूर्ण परमात्मा और अंतर्यामी कहा गया है, जिनका चरणामृत सब पाप हर लेता है और जो तन-मन-धन अर्पण कर शरण में आने वालों के द्वार स्वयं आ खड़े होते हैं।
अंत में कहा गया है कि जो प्रेमपूर्वक यह आरती गाता है, उसे आनंद और संतोष अवश्य मिलता है — यह गुरुवार के व्रत और बृहस्पति पूजा की परंपरागत आरती है।
यह भजन कब और क्यों गाया जाता है
यह आरती हर गुरुवार बृहस्पति देव की पूजा और गुरुवार व्रत के समय गाई जाती है, क्योंकि सनातन परंपरा में गुरुवार का दिन बृहस्पति देव (और भगवान विष्णु के गुरु-रूप) को समर्पित माना गया है।
जिन साधकों की जन्मकुंडली में गुरु ग्रह कमजोर हो, विवाह में विलंब हो या धन संबंधी कठिनाई हो, वे विशेष रूप से गुरुवार को यह आरती और व्रत करते हैं। पूजा में पीले वस्त्र, पीले फूल और पीली वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है।
इससे जुड़ी मान्यता
गुरुवार व्रत की प्रचलित कथा एक प्रतापी और दानी राजा की है, जो हर गुरुवार व्रत रखकर दीन-दुखियों की सहायता करता था। पर उसकी रानी को यह दान-पुण्य पसंद नहीं था और वह राजा को भी ऐसा करने से रोकती थी।
एक दिन राजा शिकार पर वन गए। उसी समय बृहस्पति देव साधु के वेश में भिक्षा माँगने महल आए। रानी ने झुंझलाकर कहा कि वह इस दान-पुण्य से तंग आ चुकी है, और ऐसा कोई उपाय बताएँ जिससे उसका सारा धन ही नष्ट हो जाए और वह चैन से रह सके। साधु ने उसे समझाने की कोशिश की, पर रानी नहीं मानी। अंत में साधु ने कहा कि यदि यही इच्छा है तो वह हर गुरुवार घर में गोबर लिपवाए, बाल पीली मिट्टी से धोए और अशुद्ध भोजन कराए — ऐसा सात गुरुवार करने से सारा धन नष्ट हो जाएगा।
रानी ने वैसा ही किया, और मात्र तीन गुरुवार में ही राजपाट की सारी संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन तक को तरसने की नौबत आ गई, तो राजा दूसरे देश चला गया और वहाँ लकड़ियाँ बेचकर गुजारा करने लगा। इधर रानी और दासी भी भूखी रहने लगीं।
एक दिन जब सात दिन तक कुछ खाने को नहीं मिला, तो रानी ने दासी को अपनी धनी बहन के पास सहायता माँगने भेजा। संयोग से उस दिन गुरुवार था और बहन कथा सुन रही थी, इसलिए वह दासी से तुरंत नहीं बोल पाई। बाद में जब बहन खुद रानी के घर आई और सारी बात जानी, तो उसने कहा कि बृहस्पति देव सबकी मनोकामना पूरी करते हैं — शायद घर में अनाज हो। देखने पर सचमुच अनाज से भरा घड़ा मिल गया।
इस चमत्कार से प्रभावित होकर रानी ने अपनी बहन से गुरुवार व्रत की विधि सीखी और उसी दिन से व्रत रखने लगी। धीरे-धीरे बृहस्पति देव की कृपा से घर में फिर धन-संपत्ति लौट आई। इस तरह यह कथा बताती है कि सच्चे मन से किया गया गुरुवार व्रत सबसे बड़ी दरिद्रता को भी दूर कर सुख-समृद्धि लौटा सकता है।
भजन के बोल
जय बृहस्पति देवा, ऊँ जय बृहस्पति देवा ।
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥
ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥
ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता ।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥
ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े ।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्घार खड़े ॥
ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी ।
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी |
ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो ।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥
ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे ।
जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ॥
ऊँ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा ॥
सब बोलो विष्णु भगवान की जय।
बोलो बृहस्पति देव भगवान की जय॥
दिल दबाकर अपना समर्थन दिखाइए

