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बाँस की बाँसुरिया पे घणों इतरावे bans ki basuriya kanha ghano itrave bhajan lyrics
Krishna Bhajan
भजन का अर्थ
यह राजस्थानी शैली का भजन कृष्ण की बाँस की बाँसुरी पर इतराने की बात करता है। कोई कहता है कि सोने की होती, हीरे-मोती की होती तो जाने क्या करते — पर बाँस की बाँसुरी पर ही इतराते हैं। जेल में जन्म लिया, देवकी के पुत्र बने, गाय चराई — हर परिस्थिति में इतराते हैं। यह भजन कृष्ण की साधारण वस्तुओं में भी असाधारण गर्व की भावना को व्यक्त करता है।
भजन के बोल
बाँस की बाँसुरिया पे घणों इतरावे लिरिक्स
बाँस की बाँसुरिया पे,
घणों इतरावे,
कोई सोना की जो होती,
हीरा मोत्यां की जो होती,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे घणों इतरावे,
जेल में जनम लेके घणों इतरावे,
कोई महालाँ में जो होतो,
कोई अंगणां में जो होतो,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,
देवकी रे जनम लेके घणो इतरावे,
कोई यशोदा के होतो,
माँ यशोदा के जो होतो,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,
गाय को ग्वालो होके घणो इतरावे,
कोई गुरुकुल में जो होतो,
कोई विद्यालय जो होतो,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे,
कोई सोना की जो होती,
हीरा मोत्या की जो होती,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,