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बाँस की बाँसुरिया पे घणों इतरावे bans ki basuriya kanha ghano itrave bhajan lyrics
कृष्ण भजन
संकलित एवं सत्यापित: Gunjan Upadhyay — भजन लेख टीम
जोड़ा गया: 1 अक्टूबर 2023
भजन का अर्थ
यह राजस्थानी-शैली का भजन कान्हा की साधारण बाँस की बांसुरी पर इठलाने (गर्व करने) के भाव को दर्शाता है। भक्त पूछता है कि यदि यह बांसुरी सोने, हीरे-मोतियों की होती तो कान्हा न जाने क्या करते — यानी साधारण वस्तु भी कृष्ण के स्पर्श से अनमोल बन जाती है।
भजन में यह भी कहा गया है कि कृष्ण ने जेल में जन्म लेकर भी इतना गौरव पाया, तो यदि वे महलों में जन्मे होते तो उनकी महिमा का क्या कहना — यह कृष्ण की सरलता में छिपी महानता का भाव व्यक्त करता है।
यह भजन कब और क्यों गाया जाता है
यह भजन जन्माष्टमी और कृष्ण भजन-कीर्तन में गाया जाता है, विशेषकर राजस्थानी लोक-शैली के भजन-संध्या कार्यक्रमों में।
कृष्ण की बांसुरी और उनके बाल-स्वरूप से जुड़े उत्सवों में भी इसे भक्त प्रेम से गाते हैं।
भजन के बोल
बाँस की बाँसुरिया पे घणों इतरावे लिरिक्स
बाँस की बाँसुरिया पे,
घणों इतरावे,
कोई सोना की जो होती,
हीरा मोत्यां की जो होती,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे घणों इतरावे,
जेल में जनम लेके घणों इतरावे,
कोई महालाँ में जो होतो,
कोई अंगणां में जो होतो,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,
देवकी रे जनम लेके घणो इतरावे,
कोई यशोदा के होतो,
माँ यशोदा के जो होतो,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,
गाय को ग्वालो होके घणो इतरावे,
कोई गुरुकुल में जो होतो,
कोई विद्यालय जो होतो,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,
बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे,
कोई सोना की जो होती,
हीरा मोत्या की जो होती,
जाणें काई करतो, काईं करतों,
बाँस की बाँसुरिया पे, घणों इतरावे,
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