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पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा || Mahashivratri special Parvat pe damru bajave bhole baba
शिव भजन
संकलित एवं सत्यापित: Gunjan Upadhyay — भजन लेख टीम
जोड़ा गया: 8 मार्च 2024
भजन का अर्थ
यह भजन कैलाश पर्वत पर भोलेनाथ के डमरू बजाने और उसकी धुन पर ब्रह्मा, विष्णु, नारद, गणपति, कार्तिक, नंदी, ऋषि-मुनि सहित संपूर्ण सृष्टि - यहाँ तक कि भूत-प्रेत - के नाचने का वर्णन करता है।
भजन के अंत में कहा गया है कि भोले अपनी ही धुन में मगन रहकर सारी सृष्टि को नचाते हैं, जो शिव की अनंत और सर्वव्यापी शक्ति को दर्शाता है।
यह भजन कब और क्यों गाया जाता है
यह भजन महाशिवरात्रि, सावन सोमवार और शिव जागरण में गाया जाता है, जब भक्त शिव के तांडव और उनकी सृष्टि-व्यापी महिमा का स्मरण करते हैं।
भजन के बोल
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा,
बजावे भोले बाबा बजावे भोले बाबा...
डमरू की धुन सुन ब्रह्मा जी आए,
नारद मुनि को नचावे भोले बाबा,
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा.....
डमरू की धून सुन विष्णु जी आए,
सारे देवो को नचावे भोले बाबा,
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा.....
गणपति नाचे कार्तिक नाचे,
नंदी को संग में नचावे भोले बाबा,
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा.....
ऋंगी भींगी श्रृंगी नाचे,
ऋषि मुनियों को नचावे भोले बाबा,
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा.....
नर और नार सभी है नाचे,
भूतो और प्रेतों को नचावे भोले बाबा,
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा....
अपनी ही धुन में भोले मगन है,
सारी सृष्टि को नचावे भोले बाबा,
पर्वत पे डमरू बजावे भोले बाबा.....
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