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शनि चालीसा Lyrics | Shani Chalisa in Hindi

शनि भजन

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संकलित एवं सत्यापित: Gunjan Upadhyay — भजन लेख टीम

भजन का अर्थ

यह चालीसा भगवान शनिदेव को समर्पित है, जिन्हें हिंदू परंपरा में कर्मफलदाता और न्याय के देवता के रूप में माना जाता है। इसमें शनिदेव के स्वरूप, उनके विभिन्न नामों और उनके प्रभाव का वर्णन किया गया है। मुख्य भाव शनिदेव की स्तुति, कृपा की प्रार्थना और जीवन के कष्टों से राहत की कामना है।

आरंभ में भगवान गणेश और शनिदेव की वंदना करते हुए उनसे भक्तों की रक्षा और कृपा की प्रार्थना की गई है। आगे शनिदेव के स्वरूप, उनके शस्त्रों और उनके विभिन्न नामों का वर्णन मिलता है। चालीसा में राम, रावण, राजा विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र, नल, पांडव और अन्य प्रसंगों के माध्यम से शनिदेव की दशा के प्रभाव का वर्णन किया गया है। इसके बाद शनिदेव के विभिन्न वाहनों और उनसे जुड़ी ज्योतिषीय मान्यताओं का उल्लेख आता है। अंत में शनि ग्रह की शांति के लिए पूजा, पीपल को जल अर्पित करने और दीपदान जैसी परंपराओं का वर्णन करते हुए शनिदेव के स्मरण से सुख प्राप्त होने की प्रार्थना की गई है।

यह भजन कब और क्यों गाया जाता है

शनि चालीसा का पाठ विशेष रूप से शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा और आराधना के समय किया जाता है। इसे शनि मंदिर में, पीपल के वृक्ष के पास या घर में श्रद्धा के साथ पढ़ने की परंपरा है। शनि जयंती और शनैश्चरी अमावस्या जैसे अवसरों पर भी इसका पाठ किया जाता है। भक्त इसे शनिदेव की कृपा प्राप्त करने और शनि से संबंधित कठिनाइयों से राहत की प्रार्थना के लिए पढ़ते हैं।

इससे जुड़ी मान्यता

हिंदू धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं और इसलिए उन्हें कर्मफलदाता तथा न्यायप्रिय देवता माना जाता है। शनि चालीसा के श्रद्धापूर्वक पाठ को शनि की कठिन दशा, साढ़ेसाती या ढैय्या जैसे समय में आध्यात्मिक सहारे और शनिदेव की कृपा की प्रार्थना के रूप में माना जाता है। शनिवार को शनिदेव की पूजा, पीपल को जल अर्पित करने और दीपदान की परंपराएं भी इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी हैं।

भजन के बोल

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल

दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज

करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज

जयति जयति शनिदेव दयाला

करत सदा भक्तन प्रतिपाला

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै

माथे रतन मुकुट छबि छाजै

परम विशाल मनोहर भाला

टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला

कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै

हिय माल मुक्तन मणि दमकै

कर में गदा त्रिशूल कुठारा

पल बिच करैं अरिहिं संहारा

पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन

यम, कोणस्थ, रौद्र, दुख भंजन

सौरी, मन्द, शनि, दश नामा

भानु पुत्र पूजहिं सब कामा

जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं

रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं

पर्वतहू तृण होई निहारत

तृणहू को पर्वत करि डारत

राज मिलत वन रामहिं दीन्हो

कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो

बनहूँ में मृग कपट दिखाई

मातु जानकी गई चुराई

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा

मचिगा दल में हाहाकारा

रावण की गति मति बौराई

रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई

दियो कीट करि कंचन लंका

बजि बजरंग बीर की डंका

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा

चित्र मयूर निगलि गै हारा

हार नौलखा लाग्यो चोरी

हाथ पैर डरवायो तोरी

भारी दशा निकृष्ट दिखायो

तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो

विनय राग दीपक महँ कीन्हों

तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी

आपहुं भरे डोम घर पानी

तैसे नल पर दशा सिरानी

भूंजी-मीन कूद गई पानी

श्री शंकरहिं गहयो जब जाई

पारवती को सती कराई

तनिक विलोकत ही करि रीसा

नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी

बची द्रौपदी होति उघारी

कौरव के भी गति मति मारयो

युद्ध महाभारत करि डारयो

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला

लेकर कूदि परयो पाताला

शेष देव-लखि विनती लाई

रवि को मुख ते दियो छुड़ाई

वाहन प्रभु के सात सुजाना

जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना

जम्बुक सिंह आदि नख धारी

सो फल ज्योतिष कहत पुकारी

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं

हय ते सुख सम्पति उपजावैं

गर्दभ हानि करै बहु काजा।

सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।

मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।

चोरी आदि होय डर भारी॥

तैसहि चारि चरण यह नामा।

स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।

धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

समता ताम्र रजत शुभकारी।

स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै।

कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।

करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।

विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।

दीप दान दै बहु सुख पावत॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

दोहा

पाठ शनिश्चर देव को, की हों 'भक्त' तैयार।

करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

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