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वट सावित्री व्रत कथा | पूजा विधि, महत्व और संपूर्ण कथा हिंदी में -Vat savitri Vrat Katha
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वट सावित्री व्रत कथा | पूजा विधि, महत्व और संपूर्ण कथा हिंदी में -Vat savitri Vrat Katha

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भजन का अर्थ

महत्व- वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए रखा जाने वाला अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या (कुछ स्थानों पर पूर्णिमा) को किया जाता है। इस दिन महिलाएँ वट वृक्ष (बरगद) की पूजा करती हैं, क्योंकि वट वृक्ष को दीर्घायु, स्थिरता और जीवन का प्रतीक माना गया है।

इस व्रत की कथा का मुख्य आधार पतिव्रता नारी सावित्री का अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लाना है। यह कथा नारी की श्रद्धा, बुद्धिमत्ता, साहस और अटूट पतिव्रता धर्म का प्रतीक मानी जाती है।

भजन के बोल

🌸 वट सावित्री व्रत कथा 🌸

प्राचीन समय में मद्र देश में अश्वपति नामक एक प्रतापी और धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उनके पास धन, वैभव और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, परंतु उन्हें संतान प्राप्ति नहीं हुई थी। संतान की इच्छा से राजा और उनकी रानी ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की तथा माता सावित्री की आराधना की।

उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने वरदान दिया कि उनके घर एक तेजस्विनी कन्या जन्म लेगी। कुछ समय बाद राजा के घर एक अत्यंत सुंदर और गुणवान कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम देवी के नाम पर सावित्री रखा गया।

सावित्री बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान, तेजस्वी और धार्मिक विचारों वाली थी। जब वह विवाह योग्य हुई, तब राजा अश्वपति ने उसे स्वयं अपने लिए योग्य वर चुनने की अनुमति दी। सावित्री वन-वन घूमकर योग्य वर की खोज करने लगी। अंततः उसने वन में रहने वाले एक तपस्वी और सत्यवादी राजकुमार सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना।

जब सावित्री अपने पिता के पास लौटी, उसी समय वहाँ देवर्षि नारद आए हुए थे। नारद जी ने बताया कि सत्यवान अत्यंत गुणवान और धर्मात्मा है, परंतु उसकी आयु बहुत अल्प है और विवाह के एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु निश्चित है। यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो गए और उन्होंने सावित्री को दूसरा वर चुनने के लिए कहा।

किन्तु सावित्री ने दृढ़ स्वर में कहा—
“आर्य कन्या जीवन में केवल एक बार ही पति का वरण करती है। मैंने सत्यवान को मन, वचन और कर्म से अपना पति स्वीकार कर लिया है।”

सावित्री के दृढ़ निश्चय के आगे सभी को झुकना पड़ा और उसका विवाह सत्यवान से हो गया। विवाह के बाद सावित्री अपने पति और सास-ससुर के साथ वन में रहने लगी। वह अत्यंत सेवा भाव से अपने परिवार की सेवा करती थी।

समय बीतता गया और वह दिन भी निकट आ गया, जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी। सावित्री ने तीन दिन पूर्व से कठोर व्रत और उपवास आरंभ कर दिया। नियत दिन सत्यवान लकड़ी काटने वन में गए। सावित्री भी उनके साथ चली गई।

वन में कार्य करते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज पीड़ा होने लगी। वह थककर सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। तभी वहाँ यमराज प्रकट हुए और सत्यवान के प्राण हरकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने उसे वापस लौटने के लिए कहा, परंतु सावित्री ने धर्म, सत्य और पतिव्रता धर्म से युक्त अत्यंत ज्ञानपूर्ण बातें कही। उसकी बुद्धिमत्ता और पतिव्रता से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे वरदान माँगने को कहा।

सावित्री ने पहले वरदान में अपने अंधे सास-ससुर की आँखों की ज्योति और उनका खोया हुआ राज्य वापस माँगा। यमराज ने “तथास्तु” कहा।

दूसरे वरदान में उसने अपने पिता अश्वपति के लिए सौ पुत्रों का वर माँगा। यमराज ने यह वरदान भी दे दिया।

अंत में सावित्री ने कहा—
“मुझे सत्यवान से उत्पन्न सौ पुत्रों का आशीर्वाद दीजिए।”

यमराज तुरंत समझ गए कि बिना सत्यवान के जीवित हुए यह वरदान पूरा नहीं हो सकता। सावित्री की अटूट निष्ठा, बुद्धिमत्ता और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।

सत्यवान पुनः जीवित हो उठे। सावित्री अपने पति के साथ आश्रम लौटी। उसके सास-ससुर को दृष्टि वापस मिली और उन्हें उनका राज्य भी पुनः प्राप्त हो गया। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रत और दृढ़ संकल्प से अपने पति को नया जीवन प्रदान किया।

🌼 निष्कर्ष

वट सावित्री व्रत कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, निष्ठा, बुद्धिमत्ता और दृढ़ संकल्प से बड़े से बड़ा संकट भी दूर किया जा सकता है। सावित्री भारतीय नारी के आदर्श पतिव्रता स्वरूप का प्रतीक मानी जाती हैं। यही कारण है कि आज भी विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए श्रद्धापूर्वक वट सावित्री व्रत करती हैं।

🌿 वट सावित्री व्रत पूजा विधि (संक्षेप में)

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु, माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करें।

  3. वट वृक्ष (बरगद) के नीचे जल, रोली, अक्षत, फूल, फल और मिठाई अर्पित करें।

  4. कच्चा सूत या धागा वट वृक्ष के चारों ओर लपेटते हुए परिक्रमा करें।

  5. वट सावित्री व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें।

  6. पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

  7. अंत में आरती करके ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान दें।

🌸 वट सावित्री व्रत के नियम

  • व्रत श्रद्धा और पूर्ण विश्वास के साथ करना चाहिए।

  • कई महिलाएँ इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं।

  • क्रोध, झूठ और अपशब्दों से दूर रहना चाहिए।

  • पूजा के समय मन को शांत और पवित्र रखें।

  • वट वृक्ष की पूजा अवश्य करें, क्योंकि इसे दीर्घायु और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

  • कथा सुने बिना व्रत को अधूरा माना जाता है।

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